कांगड़ा घाटी की तीर्थ यात्रा
यह यात्रा 8 अप्रैल से 12 अप्रैल के बीच की गई थी। पूरी यात्रा का एक संक्षिप्त ब्यौरा इस ब्लॉग में है। पूरा विस्तृत यात्रा व्रतान्त पढ़ने के लिए लिंक यह है.
यह यात्रा 8 अप्रैल से 12 अप्रैल के बीच की गई थी। पूरी यात्रा का एक संक्षिप्त ब्यौरा इस ब्लॉग में है। पूरा विस्तृत यात्रा व्रतान्त पढ़ने के लिए लिंक यह है.
भारतीय परिवारों में घूमना फिरना तभी होता है जब किसी तीर्थ स्थान पर जाने की योजना बनाई जाए। खासकर के मध्यम वर्गीय परिवारों में तो यात्राएं सिर्फ तीर्थ स्थानों पर ही होती है। पिछली दो यात्राएं अपने दोस्तों के साथ करने के बाद अब बारी थी परिवार के साथ कहीं घूम कर आने की।
हमारे परिवार में नगरकोट वाली माता की पूजा होती है यह मंदिर कांगड़ा घाटी में स्थित है तो वही जाने की जाने की योजना बनी।
मैं शिमला टॉय ट्रेन में यात्रा कर चुका था इसलिए कांगड़ा घाटी की टॉय ट्रेन की यात्रा करने के लिए मैं रोमांचित था।
हमारे परिवार में नगरकोट वाली माता की पूजा होती है यह मंदिर कांगड़ा घाटी में स्थित है तो वही जाने की जाने की योजना बनी।
मैं शिमला टॉय ट्रेन में यात्रा कर चुका था इसलिए कांगड़ा घाटी की टॉय ट्रेन की यात्रा करने के लिए मैं रोमांचित था।

Day 1
8 अप्रैल की शाम को दिल्ली से हम पूजा एक्सप्रेस से पठानकोट की ओर निकले।साइड की निचली बर्थ ने इस यात्रा का मजा दोगुना कर दिया।
यह ट्रेन सुबह 6:00 बजे पठानकोट कैंट स्टेशन पर पहुंचा देती है पर कांगड़ा घाटी की ओर जाने वाली गाड़ियां आपको पठानकोट जंक्शन स्टेशन से ही मिलेंगी जो कि 3 किलोमीटर दूर है ।आटो से 6:45 पर जब वहां पहुंचे तो पता चला कि इस स्टेशन पर सुविधाओं का दूर-दूर तक नाम नहीं है।
ऑनलाइन चेक करने पर पता चलता है कि दिन में 6 से 7 ट्रेनें कांगड़ा के लिए चलती है लेकिन असलियत में सिर्फ एक ट्रेन 11:00 बजे है इसलिए अब हमें करना था 5 घंटों का इंतजार वह भी एक ऐसे स्टेशन पर जहां पर साफ सफाई का नामोनिशान नहीं था।
ऐसा नहीं है कि यहां पर सवारियों की कमी है पर यहां आने वाले अधिकतर लोग तीर्थयात्री हैं। शिमला टॉय ट्रेन की तरह यहां पर विदेशी पर्यटक और पैसे वाले मोटे आसामी नहीं आते और शायद इसी वजह से यह रेलवे लाइन इस हालत में है। खैर 11:00 बजे जैसे तैसे ट्रेन में घुसे भीड़ भाड़ में थोड़ी धक्का-मुक्की करने के बाद खिड़की वाली सीट मिली ।11:30 पर ट्रेन चल पड़ी और थोड़ा दूर आगे निकलते ही धौलाधार रेंज पर जो नजर पड़ी तो सारी थकान दूर हो गई ।
धौलाधार रेंज आपको पठानकोट से लेकर कांगड़ा तक दिखती रहेगी धौलाधार रेंज के बराबर में ही ये रेलवे लाइन चलती रहती है।
मैं शिमला टॉय ट्रेन का सफर कर चुका हूं अगर शिमला टॉय ट्रेन को 10 में से 10 नंबर दो तो यहां पर तो पांच नंबर कभी मिलना मुश्किल है।
पर खिड़की से बाहर दिखने वाले नज़ारे बहुत राहत दे रहे थे।कांगड़ा में समतल भूमि है। यूपी बिहार की तरह यहां भी गेहूं के खेत और आम के बगीचे है पर परिदृश्य मैं धौलाधार रेंज है जो इस सफर को आसान बना देती है।धौलाधार का नाम शायद पूरे साल सफेद बर्फ से ढके रहने के कारण पड़ा है। आप जरा कल्पना कीजिए आप के बगीचे और उसके ठीक पीछे सफेद बर्फ से ढके आसमान छूते पहाड़।कुछ ऐसे ही नज़ारे थे।
यह ट्रेन सुबह 6:00 बजे पठानकोट कैंट स्टेशन पर पहुंचा देती है पर कांगड़ा घाटी की ओर जाने वाली गाड़ियां आपको पठानकोट जंक्शन स्टेशन से ही मिलेंगी जो कि 3 किलोमीटर दूर है ।आटो से 6:45 पर जब वहां पहुंचे तो पता चला कि इस स्टेशन पर सुविधाओं का दूर-दूर तक नाम नहीं है।
ऑनलाइन चेक करने पर पता चलता है कि दिन में 6 से 7 ट्रेनें कांगड़ा के लिए चलती है लेकिन असलियत में सिर्फ एक ट्रेन 11:00 बजे है इसलिए अब हमें करना था 5 घंटों का इंतजार वह भी एक ऐसे स्टेशन पर जहां पर साफ सफाई का नामोनिशान नहीं था।
ऐसा नहीं है कि यहां पर सवारियों की कमी है पर यहां आने वाले अधिकतर लोग तीर्थयात्री हैं। शिमला टॉय ट्रेन की तरह यहां पर विदेशी पर्यटक और पैसे वाले मोटे आसामी नहीं आते और शायद इसी वजह से यह रेलवे लाइन इस हालत में है। खैर 11:00 बजे जैसे तैसे ट्रेन में घुसे भीड़ भाड़ में थोड़ी धक्का-मुक्की करने के बाद खिड़की वाली सीट मिली ।11:30 पर ट्रेन चल पड़ी और थोड़ा दूर आगे निकलते ही धौलाधार रेंज पर जो नजर पड़ी तो सारी थकान दूर हो गई ।
धौलाधार रेंज आपको पठानकोट से लेकर कांगड़ा तक दिखती रहेगी धौलाधार रेंज के बराबर में ही ये रेलवे लाइन चलती रहती है।
मैं शिमला टॉय ट्रेन का सफर कर चुका हूं अगर शिमला टॉय ट्रेन को 10 में से 10 नंबर दो तो यहां पर तो पांच नंबर कभी मिलना मुश्किल है।
पर खिड़की से बाहर दिखने वाले नज़ारे बहुत राहत दे रहे थे।कांगड़ा में समतल भूमि है। यूपी बिहार की तरह यहां भी गेहूं के खेत और आम के बगीचे है पर परिदृश्य मैं धौलाधार रेंज है जो इस सफर को आसान बना देती है।धौलाधार का नाम शायद पूरे साल सफेद बर्फ से ढके रहने के कारण पड़ा है। आप जरा कल्पना कीजिए आप के बगीचे और उसके ठीक पीछे सफेद बर्फ से ढके आसमान छूते पहाड़।कुछ ऐसे ही नज़ारे थे।
खैर इन नजारों का आनंद लेते हुए कांगड़ा मंदिर के करीब पहुंचे ही थे कि वहां से दो स्टेशन पहले ज्वालामुखी रोड पर ट्रेन को रोक दिया गया और कहा गया कि आगे ट्रैक की मरम्मत चल रही है इसलिए ट्रेन आगे नहीं जाएगी।
इस वक्त ट्रेन बाणगंगा नदी के साथ साथ चलती है।नीचे करीब 100 मीटर गहराई में नदी की धारा है और ऊपर पहाड़ पर रेल की पटरी।
खैर ज्वालामुखी रोड स्टेशन से बाहर आकर हिमाचल रोडवेज की बस पकड़ी कांगड़ा यहां से करीब 30 किलोमीटर दूर था और बस का रास्ता वाह! जी वाह!क्या कहा जाए बाणगंगा नदी के साथ साथ काफी ऊंचाई पर रोड चलता है नीचे खाई में नदी बहती है और नीचे आप रेल की पटरी भी देख सकते हैं।
रास्ते में हमको एक पहाड़ पर कांगड़ा किला भी दिखा।
एक ऊंचे पहाड़ की नोंक पर काले पत्थर से बने इस किले में कभी कांगड़ा का राजसी परिवार रहा करता था।
हिमाचल के बस चालक जिस तरीके से बस चलाते हैं मुझे नहीं लगता दुनिया में कोई और चला सकता है।सर्पीले मोड़ों पर गाड़ी को इतनी रफ्तार से घुमाते हैं कि सर चकरा जाता है ।लगता है जैसे किसी रोलर कोस्टर पर बैठे हैं।अगर आंख बंद करके बैठे तो नींद भी बहुत अच्छी आती है।
इस वक्त ट्रेन बाणगंगा नदी के साथ साथ चलती है।नीचे करीब 100 मीटर गहराई में नदी की धारा है और ऊपर पहाड़ पर रेल की पटरी।
खैर ज्वालामुखी रोड स्टेशन से बाहर आकर हिमाचल रोडवेज की बस पकड़ी कांगड़ा यहां से करीब 30 किलोमीटर दूर था और बस का रास्ता वाह! जी वाह!क्या कहा जाए बाणगंगा नदी के साथ साथ काफी ऊंचाई पर रोड चलता है नीचे खाई में नदी बहती है और नीचे आप रेल की पटरी भी देख सकते हैं।
रास्ते में हमको एक पहाड़ पर कांगड़ा किला भी दिखा।
एक ऊंचे पहाड़ की नोंक पर काले पत्थर से बने इस किले में कभी कांगड़ा का राजसी परिवार रहा करता था।
हिमाचल के बस चालक जिस तरीके से बस चलाते हैं मुझे नहीं लगता दुनिया में कोई और चला सकता है।सर्पीले मोड़ों पर गाड़ी को इतनी रफ्तार से घुमाते हैं कि सर चकरा जाता है ।लगता है जैसे किसी रोलर कोस्टर पर बैठे हैं।अगर आंख बंद करके बैठे तो नींद भी बहुत अच्छी आती है।
5:00 बजे पहुंचे हम कांगड़ा पहुंचे और पहले हमने कमरा लिया और नहा धोकर फिर गए दर्शन करने।
दर्शन करने के नाद मैंने कमरे की बालकनी से कुछ ऐसा देखा कि दिन बन गया।
सामने थी करीब 10 km लंबी मैदानी घाटी और घाटी के पार थे हरे भरे पहाड़ जिनपर धर्मशाला और मैक्लोडगंज बेस हुए थे। धर्मशाला और मैक्लोडगंज की ऊंचाई को बोना साबित कर रहे थे बर्फ से ढके और आसमान छूते धौलाधार के पहाड़।
थक गए थे पर मुझ घुमक्कड़ को आराम कहां।9:00 बजे के लगभग सोने से पहले मैं कांगड़ा शहर में आसपास घूम कर आया ।यहां पर तीर्थ यात्रियों की भरमार है और पंजाबी बोली जाती है । धर्मशाला यहां से 18 किलोमीटर है मेरा बहुत मन था लेकिन किसी कारण से मैं जा नहीं पाया लेकिन अगली बार जरूर जाऊंगा हमारे होटल रूम के सामने धौलाधार पहाड़ों के नीचे मैक्लोडगंज और धर्मशाला जुगुणुओ की तरह रात को जगमग जगमग चमकते हैं।
मैं और मेरी मुसाफ़िर को में मारकर सोना पड़ा।
दर्शन करने के नाद मैंने कमरे की बालकनी से कुछ ऐसा देखा कि दिन बन गया।
सामने थी करीब 10 km लंबी मैदानी घाटी और घाटी के पार थे हरे भरे पहाड़ जिनपर धर्मशाला और मैक्लोडगंज बेस हुए थे। धर्मशाला और मैक्लोडगंज की ऊंचाई को बोना साबित कर रहे थे बर्फ से ढके और आसमान छूते धौलाधार के पहाड़।
थक गए थे पर मुझ घुमक्कड़ को आराम कहां।9:00 बजे के लगभग सोने से पहले मैं कांगड़ा शहर में आसपास घूम कर आया ।यहां पर तीर्थ यात्रियों की भरमार है और पंजाबी बोली जाती है । धर्मशाला यहां से 18 किलोमीटर है मेरा बहुत मन था लेकिन किसी कारण से मैं जा नहीं पाया लेकिन अगली बार जरूर जाऊंगा हमारे होटल रूम के सामने धौलाधार पहाड़ों के नीचे मैक्लोडगंज और धर्मशाला जुगुणुओ की तरह रात को जगमग जगमग चमकते हैं।
मैं और मेरी मुसाफ़िर को में मारकर सोना पड़ा।















Day 2
अगले दिन सुबह बाणगंगा नदी घूमने गए जो हमारे होटल से करीब 3 किलोमीटर दूर थी।रास्ते में बहुत से तीर्थयात्री नहाने जा रहे थे या लौट रहे थे। जिस तरह से ऋषिकेश में गंगा मां घूमती हैं छोटे और बड़े पत्थर के बीच से बहती है कई सारे रैपिड बनते है उसी तरह बाणगंगा नदी है।किनारे और बीच में छोटे बड़े पत्थर जमा रहते है।पानी सिर्फ घुटनो तक ही रहता है। एक 1950 का लकड़ी का पुल है जिसके नीचे मछलियां जमा रहती है क्योंकि ऊपर से लोग खाना डालते है।
यहां नहाने में तो मजा ही आ गया था।मुख्य आकर्षणों में से एक रहा।
फिर दोपहर की बस से हम ज्वालामुखी देवी मंदिर पहुंचे।
कांगड़ा से 30 km दक्षिण में इस छोटे से कस्बे का नाम ज्वालामुखी है यहां के मंदिर में प्राकृतिक रूप से माता की ज्योति जलती रहती है शायद पहाड़ के अंदर नेचुरल गैस का भंडार है।अकबर का माता को अर्पित किया हुआ सोने का छत्र भी देखा।
यहां नहाने में तो मजा ही आ गया था।मुख्य आकर्षणों में से एक रहा।
फिर दोपहर की बस से हम ज्वालामुखी देवी मंदिर पहुंचे।
कांगड़ा से 30 km दक्षिण में इस छोटे से कस्बे का नाम ज्वालामुखी है यहां के मंदिर में प्राकृतिक रूप से माता की ज्योति जलती रहती है शायद पहाड़ के अंदर नेचुरल गैस का भंडार है।अकबर का माता को अर्पित किया हुआ सोने का छत्र भी देखा।
यहां पर हम ने लंगर में खाना खाया और फिर शाम की बस से चिंतपूर्णी माता के दर्शन के लिए चल दिए। चिंतपूर्णी ज्वालामुखी करीब 28 km दूर है।
यहां का बस अड्डा नवनिर्मित है और यह से क्या दिखता है??
धौलाधार!!
शाम को चिंतपूर्णी माता के दर्शन करके एक धर्मशाला में कमरा लिया। चिंतपूर्णी कस्बे में धर्मशालाओं की भरमार है और कई लंगर लगातार चलते रहते हैं।मंदिर भी सुंदर है।
यहां का बस अड्डा नवनिर्मित है और यह से क्या दिखता है??
धौलाधार!!
शाम को चिंतपूर्णी माता के दर्शन करके एक धर्मशाला में कमरा लिया। चिंतपूर्णी कस्बे में धर्मशालाओं की भरमार है और कई लंगर लगातार चलते रहते हैं।मंदिर भी सुंदर है।





Day 3
अगले दिन हमें अंब आंदौरा रेलवे स्टेशन से हिमाचल एक्सप्रेस पकड़नी थी। सुबह माता के दर्शन करके हम अंब अंदौर पहुंच गए जो कि चिंतपूर्णी से 35 किलोमीटर दूर था।ये कस्बा समतल जमीन पर हैं ।शहर से 3 km दूर छोटा सा स्टेशन है ।यहां से सिर्फ दो एक्सप्रेस ट्रेन को चलती है।
हमारी ट्रेन 8 बजे थी।शाम को में रात को खाना होटल से लाने के लिए लिफ्ट मांगकर अम्ब गया। लिफ्ट वाले अंकल बोलने का लहजा देखकर समझ गए और बोले आप तो दिल्ली से हैं शायद।
मैंने कहा बिल्कुल ठीक पकड़े हैं ।
स्टेशन पर हमें एक परिवार भी मिला जो 27 सदस्यों के साथ यात्रा कर रहा था ।
मैं तो सुनकर बहुत चक्का रह गया जाते समय भी मुझे निचली बर्थ ही मिली थी
रात में 10:00 बजे के आसपास ट्रेन की खिड़की से गुरुद्वारा किरतपुर साहिब और आनंदपुर साहिब के भी दर्शन हो गए ।
सुबह करीब 6:00 बजे हम पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंच गए और यात्रा का समापन हुआ।
हमारी ट्रेन 8 बजे थी।शाम को में रात को खाना होटल से लाने के लिए लिफ्ट मांगकर अम्ब गया। लिफ्ट वाले अंकल बोलने का लहजा देखकर समझ गए और बोले आप तो दिल्ली से हैं शायद।
मैंने कहा बिल्कुल ठीक पकड़े हैं ।
स्टेशन पर हमें एक परिवार भी मिला जो 27 सदस्यों के साथ यात्रा कर रहा था ।
मैं तो सुनकर बहुत चक्का रह गया जाते समय भी मुझे निचली बर्थ ही मिली थी
रात में 10:00 बजे के आसपास ट्रेन की खिड़की से गुरुद्वारा किरतपुर साहिब और आनंदपुर साहिब के भी दर्शन हो गए ।
सुबह करीब 6:00 बजे हम पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंच गए और यात्रा का समापन हुआ।